Kargil war memorial

कारगिल की कविता

यही है मेरे चार धाम, यही मेरा हज है
देखो गर्व से लहरा रहा, यही मेरा ध्वज है

इन चोटियों में, इन हवाओं में
अनोखा सा गुरुर है
तन के खड़े हैं ये शिखर
दिल में नमी भरपूर है

भूलेंगे नहीं ये कभी
काले बादल जब घिर आए थे
भारत के जांबाज सपूत
आसमां से भी टकराए थे

कहां नहीं लड़ी ये सेना
तेरे और मेरे प्राण के लिए
कहां नहीं लड़ी ये सेना
भारत के मान के लिए

इन नदियों में, पहाड़ों में
वीरता की गाथाएँ हैं
ऐसे ही नहीं बजा बिगुल विजय का
कितनों ने शीश गवाए हैं

आना, जाना, पाना, खोना
माना जीवन का मंत्र है
खुद को देकर, खुद को खोना
कैसा यह तंत्र है

आज यहाँ सर झुकाए
करता मैं नमन हूँ
हर एक वीर अमर रहे
यही प्रार्थना करता हूँ

यही है मेरे चार धाम, यही मेरा हज है
देखो गर्व से लहरा रहा, यही मेरा ध्वज है

This poem was written and recorded to mark the Rajat Jayanti of Kargil Vijay Diwas at the War Memorial in Dras on July 26, 2024.

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